समर्थ साहेब बदली दास जी Photo Galary
सतनामी
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समर्थस्वामी जगजीवन साहब के चार प्रथम शिष्य
3-समर्थसाहब देवीदास पुरवाधाम जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)।
4-समर्थसाहब ख्याम दास मदनापुर जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)। समर्थस्वामी जगजीवन साहब के 14 शिष्य (14 गद्दी) |
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Wednesday, April 24, 2019
Wednesday, April 10, 2019
समर्थ साहेब नेवल दास जी Photo Galary
सतनामी संप्रदाय के संतों में समर्थ साहेब नेवल दास उच्च कोटि के सिद्ध संत एवं साहित्यकार रहे महंत श्री जगन्नाथ बख्शदास साहेब ने सुखसागर (नेवल दास कृत) की भूमिका में उल्लेख करते हुए आपका जन्म गोंडा जिले में अनुमानत: संवत 1780 में माना है तथा भक्त शिरोमणि हिंदी मासिक पत्रिका अगस्त अट्ठारह सौ अट्ठावन पृष्ठ पांच श्री कृष्ण मुरारी दास ने भी इसे सत्य माना है किंतु संप्रदाय के अंतर्गत आपका जन्म उमापुर नामक ग्राम में माना जाता है यद्यपि आप पढ़े-लिखे नहीं थे किंतु गुरु कृपा से हिंदी संस्कृत में आप पारंगत थेअवधी संत कवियों मे सतनामी संप्रदाय के ध्वज वाहक साहेव नेवल दास का प्रमुख स्थान है । एवं आप श्री जगजीवन दास के प्रधान शिष्यों मे से थे जिन्हें १४ गद्दी मे स्थान मिला । माता पिता के धार्मिक संस्कार श्री नेवल दास मे पूर्णत: ही उतर आये थे और प्रथम गुरू के रूप में माता ने ही भगवत भक्ति् को प्रेरणा दी तथा वह नित्य ही भारत के महा संतो की पावन गाथा रूपी अमृत रस का पान कराती थी अत: श्री नेवल दास का मन ज्ञान, भक्ति एवं, ईश्वर व सन्त कथाओं के रंग मे पूर्णतया रंग गया, आप की कुसाग्र बुद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 12 वर्ष की अवस्था में ही काशी नरेश के यहॉ आयोजित महायज्ञ, एवं ज्ञानयज्ञ प्रतिस्पर्धा (शास्त्रार्थ) मे सभी को परास्त कर प्रथम स्थान से स्वर्ण पदक विजेता बने। और इसी क्रम मे 12-12 वर्षो के अन्त राल पर होने वाले शास्त्रार्थ मे 3 बार विजयी रहें आप संपूर्ण जीवन मे किसी से कभी शास्त्रार्थ मे पराजित नही हुऐं।
आपका नाम यश व कीर्ति विद्धता के मामले मे विशाल थी, सभ्रांत परिवार धन धान्य सम्पन्नता, वैभव एंव प्रभाव शाली वर्चस्व सब तरह से श्रेष्ठ थे इसिलये अहं ने अपने पाश मे बांध लिया। समय पलटा तो मॉ का कहा दोहा सहज ही याद आया
धनमद बलमद राजमद, विद्यामद, बलवान।
जगजीवन दास जेहि नाम मद, दूजा गनै न आन ।।
बस इसी चिन्तन ने आपका समस्त अहं चूर-2 कर दिया अत: आप वास्तविक ईश्वरीय सत्ता की खोज करते-2 तत्कालीन ख्याति लब्ध सन्त श्री उदयरामदास जी के पास पहुचें। उदयराम दास के आग्रह पर नेवलदास को परमभक्त जानकर स्वामी जी ने मंत्र दीक्षा दी, एवं आप हरिभजन मे तल्ली्न हो गये।
प्रयागराज अवतरण
वर्षो उपरांत आपका जाना सैमसी वर्तमान (धर्मेधाम) मे श्री दूलन दास के पास हुआ उस समय प्रयाग राज का मेला चल रहा था लोग झुंड के झुंड दर्शनो के लिये जा रहे थे। आपने श्री दूलन दास के सामने प्रयाग राज की महिमा गान की और साथ चलकर वहां स्नान की इच्छा जताई। श्री दूलनदास ने समझाया वह ईश्वर कन -2 मे घट-2 मे और समस्त जड. चेतन मे व्याप्त है। किन्तु परम ज्ञानी नेवलदास सहज ही कहॉ विश्वास करने वाले थे जब तक स्वयं न देख लेते। अत: अनुनय विनय करने लगे। तब श्री दूलनदास ने मिट्टी का ढेला उठाते हुये कहा ‘यह भी ब्रम्हरूप है यह जहॉ गिरेगा वह भी ब्रम्हरूप है। यदि मेरे समर्थ सद्गुरू की वाणी सत्य है कि ईश्वर घट-2 वासी है। यदि यह सत्य है कि ईश्वर कण-कण मे है तो हे प्रयाग राज मेरा अनुरोध स्वीकार कर अपने भक्तो के उद्धार के लिये यही अवतरित हो’ यह कहकर ढेला सामने ही रख दिया तत्काल ही धरती से तीव्र जलधारा फूट पडी । दूलन दास प्रेम भक्ति , से ओत प्रोत हो गये और श्री नेवलदास के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा ।
नेवल दास की सिद्धि प्राप्ति
तत् पश्चात सन्त् दूलन दास की प्रार्थना से प्रयाग राज ने वहीं रहकर भक्तों का उद्धार व पाप नाश करने का बचन दिया एवं वह कुण्ड कर्म दही के नाम से बिख्यात हुआ पुन: कर्म दही मे दोनो सन्तो ने आनन्द पूर्वक स्नान कर खडे ही हुऐ कि अचानक समर्थ दूलन दास अंजली मे भर भर कर जल उलचने लगे, नेवल दास के पूछने पर दूलन दास ने बताया कि आपके यहॉ आग लगी है वही बुझा रहा हॅू सत्यू जानने के लिये नेवलदास घर आये जो 100 किलो मीटर से भी अधिक दूर था घटना को सत्य पाया अब उन्हे स्वयं पर अधिक ग्लानि होने लगी आपने तत्काल जाकर कोटवन मे समर्थ जगजीवन दास से प्रार्थना की कि क्या आपने बाबा दूलन दास को और मुझे अलग -2 मंत्र दिया है क्योकि बाबा दूलन दास के पास सभी सिद्धियां है पर मै अभी भी अन्ध कार मे हॅू मुझ पर कृपा कीजिये। समर्थ ने हंसकर कहा दोनेा का एक ही मंत्र है वही सबका मंत्र है। तल्लीनता से करो तब श्री नेवलदास ने तालाब मे तखत डालकर तीन दिन रात निरंतर जाप किया तथा सिद्धियां प्रत्यक्ष हो गई। सिद्धि प्राप्ति के पश्चात बाबा नेवल दास के मन मे महा वैराग्य् उत्पन्न हुआ तथा आप ईश्वरीय आनंद मे मग्न हो गोमती किनारे कठिन तप करने चले गये आप समर्थ साई जगजीवन दास जू साहब से गुरु मंत्र प्राप्त कर साधना में प्रवृत्त हुए और आपने गृहस्थ जीवन यापन किया था आपके पुत्री थी जिसका विवाह भारद्वाज गोत्रीय अम्बरदास जी के साथ हुआ था जिनके वंशज आज भी उमापुर गद्दी पर विराजमान हैं कुछ समय तक बाराबंकी सुल्तानपुर जिले की सीमा पर स्थित गोमती नदी के किनारे रेछ घाट में रहकर तपस्या की थी किंतु प्रतिकूल वातावरण के कारण यहां से आकर सुल्तानपुर जिले के दक्षिण दिशा मे धनेशा ग्राम में एक बट पेड़ के नीचे कुटी बनाकर नाम उपासना में रत हुए किंतु धनेशा के रहने वालों के व्यवहार के कारण इस स्थान को भी छोड़ कर आजीवन उमापुर में अपने निवास किया आप सदैव ही एकांत में रह कर दिन रात अखंड भजन करते थे उठते बैठते सोते जागते अजपा जाप में लीन रहते थे वर्तमान में आप का समाधि स्थल उमापुर में है जो हरचंदपुर गद्दी के काफी समीप है |
समर्थस्वामी जगजीवन साहब के चार प्रथम शिष्य
3-समर्थसाहब देवीदास पुरवाधाम जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)।
4-समर्थसाहब ख्याम दास मदनापुर जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)। समर्थस्वामी जगजीवन साहब के 14 शिष्य (14 गद्दी) |
🚩 🚩 अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक सच्चिदानंद स्वरूप श्री समर्थ साहेब जगजीवन दास की शिष्य परंपरा में श्री समर्थ साहेब पियारेदास जी का नाम बड़े ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है आगे इसी ब्लॉग में आप पढ़ेंगे कि कैसे जड़ वस्तुएं भी नाम उपासना की गवाही देती थी समर्थ साहब प्यारे दास जाति से मुसलमान थे l
धुनिया अर्थात रजाई गद्दे आदि में रुई भरकर बनाने का काम करते थे आप जाति पाति के आडंबरों से बहुत ऊपर थे आप का मानवतावादी दृष्टिकोण अध्यात्मिक ज्ञान जितना गहरा था गुरु चरणों में प्रेम भी उतना ही गहरा था आप ने आजीवन कोई शिष्य नहीं बनाया और ना ही किसी को मंत्र दीक्षा दी आप कहते थे कि अभी मैं ही पूर्ण से शिष्य नहीं बन पाया अतः बानी उपदेश आदि करते थे और दीक्षा के लिए सद्गुरु की शरण में ही भेज देते थे आपका जन्म जरौली बाराबंकी में हुआ था और यही आपकी तपोस्थली और कर्म स्थली रही आप आजीवन जरौली में ही रहे और सतलोक लीन होने के उपरांत आप की समाधि मंदिर जरौली में ही बनाई गई यहां प्रत्येक गुरुवार को भक्तों की भारी भीड़ होती है और नित्य आरती तथा पूजा होती है भक्तों में प्रसाद आदि का वितरण होता है समर्थ साहेब पियारे दास की कुछ कीर्तियां इस ब्लॉग में शामिल करने का प्रयत्न किया गया है आशा है कि सभी सतनामी भक्त लाभान्वित होंगे समर्थसाहब पियारे दास जी समर्थस्वामी जगजीवन साहब के शिष्य एवं सत्यनाम सम्प्रदाय के चौदह गद्दी में से एक हैं, आप सत्यनाम सम्प्रदाय के महान सिद्ध संत थे।आपकी तपोस्थली जरौली धाम पर दर्शनार्थ जाने के लिए बहुत ही सुगम एवं सीधा मार्ग है।जो लोग लखनऊ और सुल्तान पुर से जाना चाहते हैं उनके लिए हैदरगढ़ चौराहे से हैदरगढ़ भिटरिया मार्ग पर लगभग-(12)किलोमीटर चलकर असन्दरा बाजार पहुंच कर असन्दरा थाने के निकट से जरौली धनौली सम्पर्क मार्ग पर मात्र दो किलोमीटर की दूरी तय करते ही पियारे दास जी का स्थान है, और जो लोग लखनऊ फैजाबाद मार्ग से पियारे दास जी की तपोस्थली जरौली दर्शनार्थ आना चाहते हैं उनके लिए भिटरिया चौराहे से हैदरगढ़ रोड पर लगभग(25)किलोमीटर चलकर असन्दरा बाजार से उपरोक्त निर्देशित मार्ग से पियारे दास जी की तपोस्थली जरौली जाकर दर्शन का लाभ ले सकते हैं, अधिक जानकारी के लिये देखें धर्मे धाम ब्लॉग Dharmedham धर्मेधाम |
समर्थस्वामी जगजीवन साहब के चार प्रथम शिष्य
3-समर्थसाहब देवीदास पुरवाधाम जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)।
4-समर्थसाहब ख्याम दास मदनापुर जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)। समर्थस्वामी जगजीवन साहब के 14 शिष्य (14 गद्दी) |
सतनाम पंथ में एवं समर्थ साहेब जगजीवनदास के शिष्यों मे प्रसिद्ध संत समर्थ साहेब देवीदास हुए आपके तप तेज नाम सुमिरन और सिद्धियों के बारे में जितना ही कहा जाए वह सूर्य को दीपक दिखाने के ही बराबर होगा आपका जन्म बाराबंकी जिले में लक्ष्मणगढ़ नामक ग्राम में संवत 1735 भाद्रपद कृष्ण अष्टमी दिन मंगलवार को हुआ था आपके जन्म के विषय में रोचक कथा यह है कि पिता श्री भवानी सिंह जी गौरी शंकर के अनन्य भक्त थे लक्ष्मणगढ़ के समीप ही पांडव कालीन निर्मित गौरी शंकर का एक प्राचीन मंदिर है और ऐसा कहा जाता है कि आपके माता-पिता ने 12 वर्षों तक गौरी शंकर की कठिन आराधना की एवं गौरी शंकर के वरदान स्वरुप ही साहब देवी दास का जन्म हुआ तत्कालीन समाज में विद्यालयी शिक्षा का अधिक चलन ना था परंतु आपने स्वाध्याय से हिंदी संस्कृत उर्दू अरबी आदि का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया जो आपके साहित्य में भी देखने को मिलती है आप इतने मेधावी थे कि दोनों हाथों से दो विभिन्न विषयों पर एक ही समय में साहित्य रचना करने में समर्थ थे आपने समर्थ साहब जगजीवन दास जी महाराज से मंत्र दीक्षा ग्रहण कर बहुत दिनों तक कोटवा में रहकर गुरु सेवा व आराधन किया तदुपरांत समर्थ साईं के कहने पर आप घर चले आए परंतु पुरवा ग्राम के नारदीय झील (जो अब नर्दा ताल के नाम से जाना जाता है कहते हैं देवर्षि नारद ने यही तपस्या की थी) का वातावरण आपको ध्यान सुमिरन के लिए उपयुक्त लगा इसी झील के नजदीक आपने छुहरिया पेड़ के नीचे कुटिया चबूतरा बना कर कठोर तप किया यह वृक्ष आज भी मौजूद है आप के चार पुत्र हुए( 1)श्री साहेब राम प्रसाद दास(2) श्री साहेब नीलाम्बर दास (3)श्री साहेब राम निवाज दास(4) श्री समर्थ साहेब अनूप दास || आप की साहित्यिक रचनाओं में सुख सनाथ, गुरु चरन , विनोद मंगल ,शब्द सागर, नारद ज्ञान ,दीपक समाज, दोहावली, भ्रम विनाश ,भ्रमरगीत, चरण ध्यान ,ज्ञान ऐना ,भक्त- मंगल ,ककहरा नामा ,काजी नामा ,परवाना प्रतीत, आदि महा ग्रंथ हैं ज्यादातर ग्रंथ सत्य सुधा प्रकाशन रायबरेली से प्रकाशित हैं सतनामी ग्रंथों के प्रकाशन में सत्य सुधा प्रकाशन का अभूतपूर्व सहयोग रहा है ऐसे कल्याणकारी सहयोग हेतु समस्त सतनामी भक्त समाज आपकी (सत्य सुधा प्रकाशन की) सदैव ही मुक्त कंठ से सराहना करते हैं आप के प्रसिद्ध सिद्ध शिष्यों में (1) श्री महंत रामसेवक दास हरचंदपुर बाराबंकी(2) साध्वी साहेब सोनादासी (3) साहेब निहालचंद राय (4)साहेब गिरवर दास आदि प्रमुख थे इसके अतिरिक्त (1)साहेब दिलबर दास(2)साहेब नंदू दास (3) साहेब छोटे दास (4) साहेब भाना दास जैसे सिद्ध संतों का वर्णन भी भक्ति विनोद नामक ग्रंथ में मिलता है आप 135 वर्ष की अवस्था में विक्रमी संवत अट्ठारह सौ सत्तर (1870)भाद्रपद अष्टमी को सतलोक लीन हुए परंतु आज भी पुरवा धाम के समर्थ साहब देवीदास का स्मरण मात्र करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है पुरवा धाम में प्रत्येक पूर्णमासी को मेला लगता है एवं प्रत्येक मंगलवार को भी अधिक भीड़ देखने को मिलती है किंतु वर्ष में 3 बड़े मेलों का आयोजन होता है जो रक्षाबंधन कार्तिक पूर्णिमा एवं माघ जन्म सप्तमी को पड़ता है पुरवा धाम लखनऊ से लगभग 40 किलोमीटर दूर हैदर गढ़ बछराएं और निगोहा के बीच में नगराम से 5 किलोमीटर पूर्व में स्थित है सतनाम संप्रदाय की अनंत कीर्तियों व यश गाथा को संकलित करना संभवत: बूते से बाहर की बात है तथापि कुछ कथाये संकलित करने का प्रयास किया गया है आशा है पुरवा धाम के सभी भक्त लाभान्वित होंगे|| अधिक जानकारी के लिये देखें पुरवा धाम ब्लॉग Click on Purwadham पूर्वाधाम |
समर्थस्वामी जगजीवन साहब के चार प्रथम शिष्य
3-समर्थसाहब देवीदास पुरवाधाम जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)।
4-समर्थसाहब ख्याम दास मदनापुर जिला बाराबंकी(उत्तर प्रदेश)। समर्थस्वामी जगजीवन साहब के 14 शिष्य (14 गद्दी) |
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